हनुमान जयंती की हार्दिक बधाई

हनुमान जयंती की हार्दिक बधाई

क्या विशेष है इन जयंतिओं में !

वोही दकियानूसी बातें ,

सात बार , नौ त्यौहार

और कोई काम नहीं है क्या

मनाना है तो वेलेंटिन डे मनाओ ,

क्रिकेट में भारत की जीत को शैम्पेन से मनाओ ,

अमिताभ का , करीना का जन्मदिन मनाओ.

माना कि हनुमान भक्त शिरोमणि थे . भक्ति माने सेवा , सेवा शूद्र का धर्म है , यानि हनुमान से क्या सीखें.

और बताएं ये शाश्त्र ब्राह्मणों ने लिखे हैं. आपने लाभ के लिए . ये सब झूठे हैं . हिंदू धर्म साम्प्रदायिक है.

क्या करें भाई , छोर तो दें, पर कहीं से कोई ऑफर नहीं है .

ये साले क्रिश्तियन भी आदिवासिओं को ऑफर देते हैं. हमें दें तो इनका भी फायदा , हमारा भी ,

आखिर धर्म बदलने का कुछ फायदा भी तो होना चाहिए .

मुझ से पूछें ,

क्रिश्तियन बनने पर U S A का वीसा दे दें , देखो सारा भारत क्रिश्तियन ना हो जाये तो.

कितने तो बच्चों के एडमिशन के लिए इस्साई बन जाते हैं.

चलो फिर भी आप कहते हैं तो :

हनुमान जयंती की मुबारकबाद . हैप्पी हनुमान जयंती .

अब तो खुश हो . अब तो पीछा छोरो भाई .

पता नहीं कोई काम नहीं है क्या. अजी पेट भरों के चोचले हैं.

अपने ब्लॉग लिखने का , प्रचार का बहाना चाहिए .

हनुमान जी कृपा करते तो इतने बरे खेल हो गए, एक मिट्टी सप्लाई का ठेका भी नहीं मिला.

अजी इन देवताओं को सिर पर चढआ रखा है. मैं तो कहता हूँ , पीर पर चादर चर्हाओ , सब कल्याण होगा.




हिंदुस्तनियो ! हिन्दुस्तान का इतिहास जानो, आँखे मुंदने से क्या होगा !

हिंदुस्तनियो ! हिन्दुस्तान का इतिहास जानो

क्या आपको मालूम है गांधी जी द्वारा शुरू किया खिलाफत आंदोलन किसके लिए था .

यदि नहीं तो जानो , और भी बहुत कुछ जानो .

खिलाफत आन्दोलन

खिलाफत आन्दोलन (1919-1924) भारत में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन था। इस आन्दोलन का उद्देश्य तुर्की में खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था।

और हम आज तक समझते रहे , खिलाफत आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ था

देखिये : विकिपीडिया में :

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AB%E0%A4%A4_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8

परिचय

सन् 1908 ई. में तुर्की में युवा तुर्की दल द्वारा शक्तिहीन खलीफा के प्रभुत्व का उन्मूलन खलीफत (खलीफा के पद) की समाप्ति का प्रथम चरण था। इसका भारतीय मुसलमान जनता पर नगण्य प्रभाव पड़ा। किंतु, 1912 में तुर्की-इतालवी तथा बाल्कन युद्धों में, तुर्की के विपक्ष में, ब्रिटेन के योगदान को इस्लामी संस्कृति तथा सर्व इस्लामवाद पर प्रहार समझकर भारतीय मुसलमान ब्रिटेन के प्रति उत्तेजित हो उठे। यह विरोध भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध रोषरूप में परिवर्तित हो गया। इस उत्तेजना को अबुलकलाम आजाद, जफर अली खाँ तथा मोहम्मद अली ने अपने समाचारपत्रों अल-हिलाल, जमींदार तथा कामरेड और हमदर्द द्वारा बड़ा व्यापक रूप दिया।

गांधी जी ने 1920-21 में खिलाफत आंदोलन क्यों चलाया इसके दो दृष्टिकोण हैं:-

§ एक वर्ग का कहना था कि गांधी की उपरोक्त रणनीति व्यवहारिक अवसरवादी गठबंधन का उदाहरण था।

§ और हम आज तक समझते रहे , खिलाफत आंदोलन गाँधी जी द्वारा , अंग्रेजों के खिलाफ था

एक सवाल हिंदुओं से भी , one question from hinduu's also

एक सवाल हिंदुओं से भी ,

वे ऐसा क्यूँ समझते हैं कि उन्हें अपने धर्म के विषय में कुछ पढ़ने की आवश्यकता नहीं है.

वे बिना सीखे ही सब जानते हैं .


अशोक गुप्ता
delhi, india
ashok.gupta4@gmail.com



beauty of the god's creation, by the god's creation सुंदरता भगवान के संसार की , भगवान के जीव द्वारा

beauty of the god's creation, by the god's creation सुंदरता भगवान के संसार की , भगवान के जीव द्वारा

recieved with thanks from
Madan Baba

(Swamiji Sri Madanji)

Founder Panchvati Ashram PO Box 222, (275 Anawanda Lake Road) Callicoon Center New York 12724 (USA)

Phone: 001-845-482-5811 Fax: 001- 845-482-5073


Enjoy Tulip Gardens of Netherlands which reminds the lyrics of a popular Indian movie.
"Dekhaa Eik Khwaab To Yeh Silsiley Huye...."
(As a dream was seen, so the chain of events followed...)

Tulip gardens in Netherlands feel like Rainbow on Earth.....























With blessings
god is great
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

राम नवमी (श्री राम जन्म दिन ) कि हार्दिक बधाई , happy ramnavami.


राम नवमी (श्री राम जन्म दिन ) कि हार्दिक बधाई ,
happy ramnavami.



श्री रामभद्राचार्य जी महाराज

संपूर्ण रामायण पढ़िए :


रामचरितमानस की सूक्तियाँ

संत गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के नाम से आज कौन परिचित नहीं है। जिस तरह गुलाब का फूल बारहमासी होता है तथा हर क्षेत्र, हर रंग में पाया जाता है, उसी तरह रामचरितमानस का पाठ भी हर घर में आनन्द और उत्साहपूर्वक होता है।विद्वान साहित्यकार भी अपने आलेखॊं में मानस की पंक्तियों का उल्लेख कर अपनी बात को प्रमाणित करते हैं। तात्पर्य यह कि इसके द्वारा सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है। इस प्रकार रामचरितमानस विश्व का अनमोल ग्रंथ है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

   रामचरित मानस एहिनामा    सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा॥ 

शोधकर्ताओं के लिए रामचरितमानस एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें अनेक रत्न भरे पडे हैं तथा इसका अध्ययन-मंथन सदा नूतन लगता है। जितनी बार इसे पढा़ जाय, उतनी ही बार नई-नई रहस्यपूर्ण बातों का ज्ञान होता है। अनेक विद्वानों एवं साहित्यकारों ने इस महान ग्रंथ को अपने शोध का विषय बनाकर पीएच.डी. एवं डी.लिट. की उपाधियां प्राप्त की हैं, कर रहे हैं तथा करते रहेंगे।

रामचरितमानस के हर पद में महाकवि तुलसीदास के चिंतन, विचारों, अनुभवों के अमृतकण सूक्तियों के रूप में बिखरे हैं। विभिन्न भावों से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण सूक्तियां नीचे प्रस्तुत हैं--

   जो जग काम नचावन जेही..    जगत में ऐसा कौन है, जिसे काम ने नचाया न हो [उत्तरकांड] 
   खल सन कलह न भल नहिं प्रीति    खल के साथ न कलह अच्छा न प्रेम अच्छा [उत्तरकांड] 
   केहिं कर हृदय क्रोध नहिं दाहा    क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया [उत्तरकांड] 
   चिंता सांपिनि को नहिं खाया    चिंता रूपी सांपिन ने किसे नहीं डंसा [उत्तरकांड] 
   तप ते अगम न कछु संसारा    संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके [बालकांड] 
   तृष्णा केहि न कीन्ह बीराहा    तृष्णा ने किसको बावला नहीं किया [उत्तरकांड] 
   नवनि नीच के अति दुःखदाई,    जिमि अंकुस धनु उरग विलाई    नीच का झुकना भी अत्यन्त दुखदायी होता है, जैसे -अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना .[उत्तरकांड] 
   परहित सरस धरम नहिं भाई    परोपकार के समान दूसरा धर्म नहीं है [उत्तरकांड] 
   पर पीडा़ सम नहिं अधमाई    दूसरों को पीडित करने जैसा कोई पाप नहीं है [उत्तरकांड] 
   दुचित कतहुं परितोष न लहहीं    चित्त के दोतरफा हो जाने से कहीं परितोष नहीं मिलता [अयोध्या कांड] 
   तसि पूजा चाहिअ जस देवा    जैसा देवता हो, वैसी उसकी पूजा होनी चाहिए [अयोध्याकांड] 
   नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं    प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं    संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसको प्रभुता पाकर घमंड न हुआ हो [बालकांड] 
   प्रीति विरोध समान सन    करिअ नीति असि आहि    प्रीति और बैर बराबरी में करना चाहिए [लंकाकांड] 
   मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला    सभी मानस रोगों की जड़ मोह / अज्ञान है [उत्तरकांड] 
   कीरति भनिति भूति भलि सोई    सुरसरि सम सब कहं हित होई    कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की भांति सबका हित करती है [बालकांड] 
   सचिव बैद गुरु तीनि जौं ,    प्रिय बोलहिं भय आस    राज, धर्म,तन तीनि कर,    होई बेगहिं नास    मंत्री, बैद्य और गुरु ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ की आशा से ठकुरसुहाती कहते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों का शीथ्र ही नाश हो जाता है [सुन्दरकांड] 
   लोकमान्यता अनल सम, कर तपकानन दाहु    लोक में प्रतिष्ठा आग के समान है जो तपस्या रूपी बन को भस्म कर डालती है [बालकांड] 

राम सेतु को बचा सकते हो क्या ?

श्री रामचरित मानस के सिद्ध 'मन्त्र'

नियम-

मानस के दोहे-चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र-जप की आवश्यकता हो, उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये।

अष्टांग हवन सामग्री

१॰ चन्दन का बुरादा, २॰ तिल, ३॰ शुद्ध घी, ४॰ चीनी, ५॰ अगर, ६॰ तगर, ७॰ कपूर, ८॰ शुद्ध केसर, ९॰ नागरमोथा, १०॰ पञ्चमेवा, ११॰ जौ और १२॰ चावल।

जानने की बातें-

goswamiji1.gif

जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है, उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) १०८ बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में 'स्वाहा' बोल देना चाहिये।
प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से १०८ आहुति के लिये एक सेर (८० तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम-ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम, किशमिश (द्राक्षा), अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध ४ आने भर ही डालने से काम चल जायेगा।
हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता १०८ की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये।
मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं।
सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों, वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार १०८ आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा।
एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम १०८ बार प्रातःकाल या रात्रि को, जब सुविधा हो, जप करते रहना चाहिये।
कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये।
१॰ विपत्ति-नाश के लिये
"राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।"
२॰ संकट-नाश के लिये
"जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।"
३॰ कठिन क्लेश नाश के लिये
"हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥"
४॰ विघ्न शांति के लिये
"सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥"
५॰ खेद नाश के लिये
"जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥"
६॰ चिन्ता की समाप्ति के लिये
"जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥"
७॰ विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये
"दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥"
८॰ मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये
"हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।"
९॰ विष नाश के लिये
"नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।"
१०॰ अकाल मृत्यु निवारण के लिये
"नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।"
११॰ सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये / भूत भगाने के लिये
"प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥"
१२॰ नजर झाड़ने के लिये
"स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।"
१३॰ खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए
"गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।"
१४॰ जीविका प्राप्ति केलिये
"बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।"
१५॰ दरिद्रता मिटाने के लिये
"अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।"
१६॰ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये
"जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।"
१७॰ पुत्र प्राप्ति के लिये
"प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।'
१८॰ सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये
"जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।"
१९॰ ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये
"साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।"
२०॰ सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
२१॰ मनोरथ-सिद्धि के लिये
"भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।"
२२॰ कुशल-क्षेम के लिये
"भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।"
२३॰ मुकदमा जीतने के लिये
"पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।"
२४॰ शत्रु के सामने जाने के लिये
"कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥"
२५॰ शत्रु को मित्र बनाने के लिये
"गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।"
२६॰ शत्रुतानाश के लिये
"बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥"
२७॰ वार्तालाप में सफ़लता के लिये
"तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥"
२८॰ विवाह के लिये
"तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥"
२९॰ यात्रा सफ़ल होने के लिये
"प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥"
३०॰ परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के लिये
"जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥"
३१॰ आकर्षण के लिये
"जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥"
३२॰ स्नान से पुण्य-लाभ के लिये
"सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।"
३३॰ निन्दा की निवृत्ति के लिये
"राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
३४॰ विद्या प्राप्ति के लिये
गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥
३५॰ उत्सव होने के लिये
"सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।"
३६॰ यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये
"जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।"
३७॰ प्रेम बढाने के लिये
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
३८॰ कातर की रक्षा के लिये
"मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।"
३९॰ भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये
रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥
४०॰ विचार शुद्ध करने के लिये
"ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।"
४१॰ संशय-निवृत्ति के लिये
"राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।।"
४२॰ ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये
" अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।"
४३॰ विरक्ति के लिये
"भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।"
४४॰ ज्ञान-प्राप्ति के लिये
"छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।"
४५॰ भक्ति की प्राप्ति के लिये
"भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।"
४६॰ श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये
"सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।"
४७॰ मोक्ष-प्राप्ति के लिये
"सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।"
४८॰ श्री सीताराम के दर्शन के लिये
"नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम ।
लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥"
४९॰ श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये
"जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।"
५०॰ श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये
"केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।"
५१॰ सहज स्वरुप दर्शन के लिये
"भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।"

श्री राम जय राम जय जय राम || श्री राम जय राम जय जय राम ||श्री राम जय राम जय जय राम

श्री राम जय राम जय जय राम || श्री राम जय राम जय जय राम || श्री राम जय राम जय जय राम